सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीवन परिचय | Biography of surya kumar tripathi nirala

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म सन 1897 मैं बंगाल के महिषादल राज्य में हुआ था।उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बड़कोला ग्राम के निवासी थे। ढ़ाई वर्ष की आयु में उन्हें माता की गोद से वंचित होना पड़ा और उनके पालन पोषण का भार उनके पिता के कंधों पर आ पड़ा।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रारंभिक शिक्षा महिषादल में हुई। संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन उन्होंने घर पर ही किया। 14 वर्ष की उम्र में उनका विवाह मनोहरा देवी के साथ संपन्न हुआ। वे साहित्य और संगीत में रुचि रखती थी। उनकी प्रेरणा से ही निराला जी लेखन में प्रवृत्त हुए।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीवन परिचय | Biography of surya kumar tripathi nirala

22 वर्ष की उम्र में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की पत्नी का निधन हो गया जिससे वे अति दुखी हुए। महिषादल की नौकरी छोड़कर उन्होंने समन्वय और मतवाला का संपादन किया। निरालाजी गरीबी एवं कष्टों में पीसकर विक्षिप्त हो गए तथा सन् 15 अक्टूबर 1961 मैं उनका देहावसान हो गया।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रचनाएँ

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी बहुमुखी प्रतिभा वाले साहित्यकार थे। कविता के अतिरिक्त उन्होंने उपन्यास कहानियों, निबंध, आलोचना और संस्मरण भी लिखे है। उनकी प्रमुख काव्य रचनाएं हैं – परिमाल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अनिमा, अपरा, बेला,नेय पत्ते, आराधना, अर्चना, आदि,। गद रचनाओं मै चतुरी चमार, अलका, प्रभावती,अप्सरातथा निरुपमा, आदि उनकी श्रेष्ठ गज रचनाएं हैं।

साहित्यिक परिचय

वे कवी थे और छायावाद के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक थे। उनकी कविता में विषय की विविधता और नवीन प्रयोग की बहुलता है। शृंगार, रहस्यवाद, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति वर्णन के अतिरिक्त शोषण और वर्ग भेद के विरुद्ध विद्रोह, शोषित एवं दिन ही जन के प्रति सुहानुभूति तथा पाखंड और प्रदर्शन के प्रति व्यंग्य उनके काव्य की विशेषताएं हैं।

भाषा शैली

निराला जी की दो शैलियाँ स्पष्ट है एक उत्कृष्ट छायावादी गीतों में प्रयुक्त, लंबी समस्त पदावली युक्त, तत्सम बहला, गहन विचारों से ओतप्रोत शैली और दूसरी सरल, परवाहपूर्ण, प्रचलित उर्दू के शब्द लिए व्यंग्यपूर्ण और चुटीली शैली। भाषा पर निराले जी का पूर्ण अधिकार था। उन्होंने परिमार्जित साहित्यिक खड़ीबोली में रचनाएं की हैं।

निराला जी ने मुक्त छंद का आविष्कार किया। निराला जी के काव्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, ध्वन्यात्मकता, तथा विशेष वि प्रिय, आदि अलंकार प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

उनकी रचनाओं में आग है, पओरुष है।या और है सड़ी गली परंपराओं के प्रति विद्रोह। कुल मिलाकर निराला जी हिंदी के क्रांतिकारी कवि थे। वर्ण्यविषय, भाषा,भाव, शैली, छंद, अलंकार, गति, लय,आधे की दृष्टि से निराला जी का काव्य अत्यंत निराला है।

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