सूरदास जीवन परिचय | Biography of Surdas

सूरदासजी कौन थे? कहां के रहने वाले थे ? उनके माता-पिता कहां पर रहते थे? आज हम इन सब के बारे में जानेगे…..

भक्तिकाल की सगुण धारा के कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास अग्रगण्य है। वे हिंदी साहित्यकारों के सूर्य कहे जाते हैं। कृष्ण भक्ति की जो धारा सूरदास ने प्रवाहित की उसने जन जन के हृदय मे माधुरे का का संचार किया। वे बात्सल्य एवं श्रृंगार के सम्राट कहे जाते हैं।

भले ही वे नेत्रहीन रहे ,किंतु उनकी काव्य प्रतिभा विलक्षण थी। पुष्टिमार्ग में दीक्षित सूरदास अष्टछाप के कवि थे और वल्लभभाई चार्य जी के शिष्य थे। कृष्ण को जन जन के हृदय में प्रतिष्ठित करने का श्रेय सुरदास को ही दिया जाता है। वे ब्रज भाषा के सर्वश्रेष्ठ कभी माने जाते हैं। उनके संबंध में कही गई यह उक्ति उनकी महानता को प्रतिपादित करती है।

सूरदास जीवन परिचय | Biography of Surdas

जीवन परिचय

कवि सूरदास का जन्म सम्वत 1534 अर्थार्थ सन 1478 मैं आग्रह के समीप रूण कता ग्राम में हुआ था। महाप्रभु बल्लभाचार्य जिन्हें इन्हें दीक्षा प्रदान की थी और गोवर्धन स्थित श्रीनाथजी के मंदिर में इनको कीर्तन करने के लिए नियुक्त कर दिया था। सुर नित्य नया पद बना कर और एक तारे पर गाकर भगवान की स्तुति करते थे। सूरदास मथुरा के गौ घाट पर रहते थे। पहले वे विनय के पद गाया करते थे। बाद में वल्लभचार्य के संपर्क में आने पर कृष्ण लीला का गान करने लगे।

वल्लभाईचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने अष्टछाप की स्थापना की, जिसमें सुरदास को स्थापित किया गया। सुर के अंधत्व को लेकर विवाद है। कुछ विद्वान इन्हें जन्मांध मानते हैं। और कुछ कहते हैं कि सूरदास ने श्रीकृष्ण की लीलाओं का जो सूक्षम अंकन किया है और रूप रंग की जो कल्पनाएँ की है, उसके आधार पर उनका जन्म आंध्र होना असंभव सा प्रतीत होता है। सूरज की मृत्यु मथुरा के निकट पारसोली नामक ग्राम में संभवत 1640 अर्थार्थ सन 1583 के लगभग हुई।

रचनाएँ

सूरदास द्वारा रचित ग्रंथ है – सूरसागर, सूरसारावली, और साहित्य लहरी।

सूरसागर

सूरसागर के वर्ण्यविषय का आधार, श्रीमद् भागवत है। बूटी को भव्य एवं उदात्त रूप में चित्र करते समय श्रृंगार और माधुर्य का जैसा वर्णन सुर ने अपने सूरसागर में ब्रज भाषा में किया है वैसा उन से पूर्व किसीलोक भाषा में नहीं हुआ था। सूरसागर का सर्वाधिक मर्मस्पर्शी अंश भ्रमरगीत है। जिसमें गोपियों की वाक्यपटुता अत्यंत मनोहारिणी है। कहा जाता है कि इसके पदों की संख्या 1,25,000 थी जिसमें से अब केवल 10,000 पद ही मिलते हैं। सूरसागर के पद गीता से युक्त हैं जिन्हें भक्त बड़ी तन्मयता से गाते हैं।

सूरसारावली

, विद्वानों ने इस ग्रंथ को विवादास्पद माना है तथापि रचनाशैली, विषयवस्तु, भाषा, भाव सभी दृष्टियों से यह सूरदास की प्रामाणिक रचना है इसमें 1107 छंद है।

साहित्य लहरी

इस ग्रंथ में सूरदास के दृष्टकूट पद संकलित है जिनकी संख्या 118 है। रिद्धि शास्त्र का विवेचन भी इन पदों में मिलता है। विशेष रूप से नायिकाभेद और अलंकार निरुपण इस ग्रंथ की विषयवस्तु है। कहीं कहीं श्रीकृष्ण की बाललीला से संबंधित पद भी इसमें है। महाभारत के कुछ प्रसंग भी साहित्यलहरी में वर्णित है।

निष्कर्ष

सुर की विषय वस्तु में मौलिकता है। शैली में कलात्मकता है।उनकी जैसी साफ ब्रज भाषा का प्रयोग बाद में भी हिंदी का कोई कभी नहीं कर सका अतः वे ब्रज भाषा के सर्वश्रेष्ठ कभी कहे जा सकते ।राधा कृष्ण के प्रेम का कृष्ण की बाल लीलाओं का तथा गोपियों की विरह वेदना का हृदय स्पर्शी एवं मार्मिक चित्रण करने में सूरदास को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है।

सुर कहा संपूर्ण काव्य गए हैं। जिसे विभिन्न राग रागिनियों में गाया जा सकता है। वे भक्त वे भक्त शिरोमणि कहे जा सकते हैं। वे विद्यापति नामदेव आदि कृष्णभक्त है। श्रृंगार और वात्सल्य की तो वे सम्राट ही है। अन्य कवियों ने इन विषयों पर जो कुछ लिखा वह सूर की जूठन की प्रतीत होता है। इसलिए किसी कवि ने सुर के विषय में यह उक्ति कही है

तत्व तत्व सूरा कहीं और सब झूठी

सुर की भक्ति भावना

सूरदास भक्ति काल के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। वे सगुण भक्ति धारा के कृष्ण भक्ति धारा के कविहै। उनकी भक्ति पुष्टिमार्गीय भक्ति है जिसमें भगवान के पोषण या अनुग्रह पर विशेष बल दिया जाता है। अर्थार्थ ईश्वर की कृपा ही पुष्टि है। सूरदास पुष्टिमार्ग में दीक्षित थे और वल्लभभाई चार्य के शिष्य थे। उनकी गणना अष्टछाप के कवियों में की जाती है।

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