सुमित्रानंदन पंत जीवन परिचय | Biography of Sumitra Nandan Pant

सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। छायावादी काव्य की संपूर्ण कोमलता और कमनीयता इनके काव्य में साकार हो उठी है प्रकृति के हरे भरे वातावरण में बैठकर जब यह कल्पनालोक में खो जाते थे तो प्रकृति की सुंदरता का सर्जन समय ही मूर्त हो उठता और मानवता के मंगल में उन्नयन के स्वर गूंज उठते।

सुमित्रानंदन पंत जी ने स्वयं स्वीकार किया है कि कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृतिनिरीक्षण से मिली जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कुर्माचल प्रदेश को है।

सुमित्रानंदन पंत जीवन परिचय | Biography of Sumitra Nandan Pant

जीवन परिचय

प्रकृति के अनुपम चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म हिमालय की गोद में बसे उत्तरांचल प्रदेश के को सानी ग्राम में 20 मई सन् 1900 को हुआ था। जन्म के कुछ घंटों पश्चात ही इनकी माता का निधन हो जाने के कारण इनका लालन पालन उनकी दादी ने किया।

गांव की पाठशाला और राजकीय हाईस्कूल अल्मोड़ा से शिक्षा प्राप्त करने के बाद काशी से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। अल्मोड़ा में पढ़ते समय ही उन्होंने अपना नाम गोसाईदत्त से बदलकर सुमित्रानंदन रख लिया। इसके बाद जब ये इलाहाबाद के सेंट्रल म्योर कॉलेज से इंटर कर रहे थे तभी गांधीजी के आंदोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ बैठे और स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्ला को अध्ययन किया।

अपने कोमल स्वभाव के कारण सत्याग्रह में सम्मिलित नहीं हुए और साहित्य साधना में संलग्न हो गए। सन 1931 में ये कलाकार आ।वहाँ मार्क्सवाद का अध्ययन किया और फिर प्रयाग आकर प्रगतिशील विचारों की पत्रिका।

सन1942 में भारत छोड़ो आंदोलन से प्रेरित होकर लोकायन नामक सांस्कृतिक पीठ की योजना बनाई। उसे क्रियान्वित करने के लिए विश्व प्रसिद्ध मृतक उदय शंकर से संबंध स्थापित किया और भारत ब्राह्मण के लिए निकल पड़े। इसी भ्रमण में इनका श्रीअरविन्द से परिचय हुआ और उनके दर्शन से प्रभावित होकर प्रयाग लौटकर अनेक काव्य संकलन प्रकाशित किए जिन पर अरविन्द दर्शन कल स्पष्ट प्रभाव लगता है। नहीं। यथा स्वर्ण किरण, स्वर्ण धुली,उत्तरा आदि।

सन 1950 मैं आकाशवाणी से संबंध हुए और प्रयाग में रहकर स्वछंद रूप से साहित्य सृजन करने लगे भारत सरकार ने इनको पद्मविभूषण की उपाधि से अलंकृत किया। इन्हें लोकायतन पर सोवियत **** नेहरू पुरस्कार और चिदंबरा पर ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। 29 दिसंबर सन 1977को इनका निधन हो गया।

रचनाएँ

रचनाएँ उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण इस प्रकार है

  • काव्य कृतियां – वीणा, ग्रंथी, पल्लव, गुंजन, युगांत, युगवाणी, स्वर्ण किरण, स्वर्णधूलि, युगपत उत्तरा,, बानी, कला और बूढ़ा चाँद, चिदंबरा, पुरुषोत्तम राम, पतझर, गीत हंस, गीत पर्व आदि।

इनमें से वीणा, ग्रन्थि, पल्लव और गंजन छायावादीदिया है जबकि युगांत युगवाणी प्रगतिवादी रचनाएं हैं।

  • उपन्यास – हार
  • कहानी संग्रह– पांच कहानियाँ।

इसके अतिरिक्त उमरैया की रुबाइयों का हिंदी अनुवाद मधुज्वाल में किया है और अनेक संग्रहों की भूमिकाएं भी लिखी है जो इनके आलोचक रूप में उजागर करती है। पंत जी के काव्य का विकास 3 रूपों में हुआ है छायावादी कवि के रूप में, प्रगतिवादी कवि के रूप में, और अध्यात्मवादी कवि के रूप में। इनका काव्य विकास वीणा से प्रारंभ होकर पल्लव एवं गुंजन में विकसित होता हुआ युगांत पर समाप्त हो जाता है।

सुमित्रानंदन पंत काव्य का दूसरा चरण प्रगतिवादी रचनाओं का है। इसके अंतर्गत कवि के तीन संकलन है युगांत, युगवाणी और ग्रामीण। सुमित्रानंदन पंत जी की रचनाओं का अंतिम चरण अरविन्द दर्शन एवं नव मानवतावाद से प्रभावित है। स्वर्ण किरण स्वर्णधूलि उत्तर आलोक आया चिदंबरा आदि इसके अंतर्गत कवि के निम्न संगलन लिए जा सकते हैं।

हिंदी साहित्य में स्थान

कविवर सुमित्रानंदन पंत आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक है। उनकी रचनाओं को पाठकों ने सम्मानित किया है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित पंत जी हिंदी के महान कवियों में से एक है।

छायावाद और प्रगति बाद दोनों ही काव्य धाराओं पर उन्होंने अपनी लेखनी चलाई है हिंदी काव्य में प्रगति सुंदरी का सुकुमार चित्र अंकित कर उसे शहर सौंदर्य के चर्चित तेरे और कोमल भावनाओं के कवि के रूप में पन्त जी सदैव अमर रहेंगे।

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