सुभद्रा कुमारी चौहान | जीवन परिचय | Biography of subhadra kumari chauhan

सुभद्रा कुमारी चौहान  जीवन परिचय

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म मैं इलाहाबाद जिले में स्थित निहालपुर मोहल्ले के एक संपन्न परिवार में हुआ था। इनके पिता रामनाथ सिंह सुशिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। बहुत छोटी अवस्था से इन्हें हिंदी काव्य में विशेष प्रेम था जो बाद में जाकर पल्लवित हुआ।

सुभद्रा कुमारी चौहान जीवन परिचय | Biography of subhadra kumari chauhan

इनका विवाह खंडवा मध्यप्रदेश निवासी ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान के साथ हुआ। विवाह के साथ ही सुभद्रा जी के जीवन में एक नवीन मोड़ आया। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आंदोलन का इन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उससे प्रेरित होकर यह राष्ट्र प्रेम पर कविताएँ लिखने लगीं ।

दोनों पति पत्नी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए कटिबद्ध हो गए। उनकी कविताएं इसलिए आजादी की आग से ज्वाला मई बन गई है। इनके पिता ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लेते रहे। सुभद्रा जी ने असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण अपना अध्ययन छोड़ दिया था। और पति के साथ राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेती रही।जिसके परिणाम स्वरूप ये कई बार जेल भी गईं।

ये मध्यप्रदेश विधानसभा की सदस्य भी रहीं। सन 1948 मैं एक मोटर दुर्घटना में इनकी असामयिक मृत्यु हो गई।

सुभद्रा कुमारी चौहान रचनाएँ

सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य साधना के पीछे उत्कट देशप्रेम, अपूर्व साहस तथा आत्मोत्सर्ग की प्रबल कामना है। इनकी कविता में सच्ची वीरांगना का बोझ और शौर्य प्रकट हुआ है। हिंदी काव्य जगत में ये अकेली ऐसी कावित्री थी जि

न्होंने अपने कंठ की पुकार से, लाखों भारतीय युवक युवतियों को युग की आक्रमण उदासी को त्याग स्वतंत्रता संग्राम में अपने को झोंक देने के लिए प्रेरित किया। वर्षों तक सुभद्रा कुमारी चौहान जी की झांसी वाली रानी थी और वीरों का कैसा हो वसंत, शीर्षक कविताएँ लाखों तरुण तरुणियों के हृदय में क्रांति की ज्वाला फूंकती रही।

मुकुल और चित्रधारा इनकी प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है, सीधे साधे चित्र, बिखरे मोती, और उन्मादिनी इनकी कहानियों के संकलन है।

भाषा

सुभद्रा कुमारी चौहान जी की भाषा सीधी सरल तथा स्पष्ट एवं आडंबरहीन खड़ी बोली है। मुख् यत दो रस, इन्होंने चित्रित किए हैं वीर तथा बात्सल्य। अपने काव्य में पारिवारिक जीवन के मोहक चित्र भी इन्होंने अंकित किए हैं जिनमें वात्सल्य की मधुर व्यंजना हुई है। इनके काव्य में एक और नारीसुलभ ममता तथा सुकुमारता है और दूसरी ओर बिजनी के जौहर की भीषण ज्वाला।

अलंकारों अथवा कल्पित प्रतीकों के मोह में न पड़कर सीधी साधी स्पष्ट अनुभूति को इन्होंने प्रधानता दी है। शैली घर के रूप में सुभद्रा जी की शैली में सरलता विशेष गुण है। नारी हृदय की कोमलता और उसके मार्मिक भाव पलों को नितांत स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत करना इनकी शैली का मुख्य आधार है।

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