समाज और साहित्य में आत्मा और शरीर का संबंध पर निबंध

प्रस्तावना : साहित्य वह है जिसमें हित की भावना हो साहित्य भाव ,साहित्य, स + हित=हित साहित या कल्याणकारी, साहित्य, युग और परिस्थितियों की अभिव्यक्ति है अभिव्यक्ति हदय के माध्यम से होती है कवि और साहित्यकार युग और अपने आंसुओं से सींखते हैं उनकी अश्रुराशि आने वाली पीढ़ियों को सजग और सावधान कर जीवन क्षेत्र में अग्रसर होने की नूतन प्रेरणा प्रदान करती है साहित्य अपने समाज का जीवन संपूर्ण सांगोपांग एवं सत्य चित्रण करता है प्रकृति के सुंदर रूपकाशि को साहित्य उजागर करता है मानव मन उस सौंदयृ छटा की अनु भूमि कर उससे तादात्म्य स्थापित करता है वही तादात्म्य संबंध उसके हृदय ने कोमल व मधुर स्वर गुंजित करता है यही गुंजन विभिन्न कलाओं का रूप लेता है और साहित्य का सृजन होता है

समाज और साहित्य में आत्मा और शरीर का संबंध

समाज और साहित्य में आत्मा और शरीर

कवि व लेखक अपने समाज के मस्तिष्क भी हैं और मुख भी कवि की पुकार समाज की आवाज है वह समाज का उन्नायक और इतिहास का विधायक होता है उसकी भाषा में समाज के भावों की अभिव्यक्ति होती है उसके द्वारा समाज के हद्य को समझने का अवसर मिलता है मुंशीन प्रेमचंदजी के शब्दों में सत्य जहां आनंद का स्त्रोत बन जाता है वहीं वह साहित्य बन जाता है रविंद्र रविंद्र के शब्दों में जिस अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य प्रयोजन के रूप को व्यक्त करना नहीं अपितु विशुद् आनंद रूप को व्यक्त करना है उसी को साहित्य कहते हैं आंग्ल विद्न मैथ्यू आनलड नेम साहित्य को जीवन की आलोचना माना है Poetry is at buttom a criticism of life , पाश्चात्य विद्वान वर्ष फील्ड ने कहा है = Literature is the brain of humanity: अर्थात साहित्य मानवता का मस्तिष्क है उपयुक्त परीभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि कवि व लेखक अपने समय का प्रतिनिधि होता है उसको जैसा मानसिक भोजन मिलता है वैसी ही उसकी कृती होती है

साहित्य का सृजन समाज का धरातल से होता है समाज की उन्नति व संपन्नता को साहित्य ही अभिव्यक्त करता है सामाजिक शांति अशांति सजीवता निजीव्ता सभ्यता असभ्यता का निर्णायक एकमात्र साहित्य ही है साहित्य समाज से भिन्न कोई कोई वस्तु नहीं है आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबंध है साहित्य और समाज अनयोनयाश्रित है
चाहते हमारी विज्ञासावति को संतुष्ट करना है ज्ञान पिपासा को तृप्त करता है और मानसिक क्षुधा को शांत करता है साहित्य में अद्भुत शक्ति है असंभव को संभव कर देता है तोप तलवार और बम के गोले में जो शक्ति नहीं है वह साहित्य में है यूरोप में हानिकारक रूढ़ियों के उन्मूलन का कार्य साहित्य ने किया जातीय स्वतंत्रता के बीज उसी ने बोए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के भावों को उसने ही पुस्ट कर आगे बढ़ाया पतित और दलित जातियों तथा देशों का पुनरुत्थान भी इसी ने किया है

फ्रांस की क्रांति के जन्मदाता वहां के साहित्यकार रूसो और वाल्टेयर थे मैजिनी के लेखौं ने इटली को उत्थान की और अग्रसर किया मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में ग्रामीण जीवन की व्यथा को उजागर किया जमीदारों के अत्याचारों को ममांतक चित्रण कर जमींदार प्रथा के उम्मीदवारी प्रथा के उन्मूलन की जोरदार वकालत की

भारतीय समाज में दिखाई देने वाला परिवर्तन विदेशी साहित्य के ही प्रभाव है अंग्रेज तलवार और शक्ति द्वारा भारत कोद दासता के बंधन में इतना नहीं बांध सके जितना अपने साहित्य को प्रचार और हमारे साहित्य को ध्वस्त करके सफलता प्राप्त कर सके यह अंग्रेजी साहित्य का ही प्रभाव है की हमारे विचार आदर्श और शिष्टाचार बदल रहे हैं

उपसंहार – समाज और साहित्य

साहित्य हमारे आंतरिक भावों को जीवित रखता है और हमारे व्यक्तित्व को सिथर बनाता है उत्तम साहित्य का प्रयोजन समाज को केवल यथावत प्रतिबिंबित करना ही नहीं होता उसे प्रेरणा देना भी होता है और समाज का निर्माण करना भी होता है समाज और साहित्य में आत्मा और शरीर का संबंध है समाज व साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं एक से दूसरे पृथक् करना न तो संभव है और न ही उपयुक्त इसलिए साहित्यकार को समाज कल्याण की भावना से प्रेरित होकर साहित्य सर्जन करना चाहिए

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