मोहन राकेश जीवन परिचय | Biography of Mohan Rakesh

मोहन राकेश कौन थे? कहां के रहने वाले थे ? आज हम इन सब के बारे में जानेगे…..

मोहन राकेश आधुनिक परिवेश से जुड़कर साहित्य सृजन करने वाले गद्यकार है। अपने अपनी अद्वितीय प्रतिभा के बल पर हिंदी नाटक को नवीन दिशा दी है तथा कथा साहित्य में नए युग का सूत्रपात किया है। सै यात्रा वृतांतों में सर्वथा मौलिक तथा नवीन शैली का प्रयोग करके सराहनीय कार्य किया है। राकेश जी संस्मरण किसी घटना थ व्यक्ति विशेष के सचिव चित्र प्रस्तुत करने में सक्षम है।

मोहन राकेश जीवन परिचय | Biography of Mohan Rakesh

मोहन राकेश जीवन परिचय |

मोहन राकेश का जन्म सन 1924 ईस्वी में पंजाब के अमृतसर शहर में हुआ था इनके पिता श्री करम चंद गुगलानी वकील थे परंतु साहित्य और संगीत में वे रुचि रखते थे। इन्होंने लाहौर के ओरिएंट कॉलेज सेअंकित शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर हिंदी में संस्कृति में एमए किया।

तत्पश्चात उन्होंने अध्यापन का कार्य बम्बई, शिमला, जलंदर, तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में किया, परन्तु इस कार्य में विशेष रुचि न होने के कारण त्यागपत्र देकर सन 1962 – 63 मैं मासिक पत्रिका सारिका का संपादन किया कुछ समय बाद यह कार्य भी छोड़ दिया और स्वतंत्र लेखन का कार्य प्रारंभ किया। सन 1963से1972स्वतंत्र लेखन किय। नाटक की भाषा पर कार्य करने के लिए इन्हें नेहरू फैलोशिप प्रदान की गई। विवाह के पश्चात विन का गृहस्थ जीवन सुखी न रहा तथा असमय ही1972 मैं ही इनका का देहांत हो गया।

मोहन राकेश की कृतियाँ

  • उपन्यास – अंधेरे बंद कमरे, ना आने वाला कल, अंतराल, नीली रौशनी की बाहें।
  • कहानी संग्रह – क्वार्टर, पहचान, बारिश तीन संग्रहों में कुल पांच चार कहानियाँ।
  • निबंध संग्रह – परिवेश, बकलम खुद।
  • यात्रा विवरण– आखरी चट्टान तक।
  • जीवनी संकलन – समय सार थी।
  • नाट्यकृति
  • याँ – आषाढ़ का 1 दिन,लहरों के राजहंस, आधे अधूरे।
  • एकांकी संकलन – अंडे के छिलके, अन्य को की तथा बीज नाटक,, दूध और दांत,
  • अनूदित नाटक – मृच्छकटिक, शकुंतल इन दोनों नाटकों का हिंदी रूपांतर।

भाषागत विशेषताएँ

राकेश जी की भाषा विषय अनुकूल सरल तथा गंभीर रूप धारण करती है। अपने साहित्य में उन्होंने तत्सम शब्दावली से युक्त खड़ी बोली को लिया जो शुद्ध, परिमार्जित संस्कृतनिष्ठ, तथा व्यावहारिक है। जहाँ कहीं उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग भी हुआ है।

उनकी भाषा में लाक्षणिकता की प्रधानता है तथा बिंबविधान भी विद्यमान है। प्रकृति के बाहरी सौंदर्य को उपयुक्त शब्दावली, रेखाओं तथा ध्वनि बिम्बों के माध्यम से व्यक्त करने से अपूर्व सफलता प्राप्त की है।

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