मुड़ो प्रकृति की ओर पर निबंध | Essay on Turn Towards Nature

मुड़ो प्रकृति की ओर | Mudo Prakriti ki aur par nibandh | मुड़ो प्रकृति की ओर पर निबंध | Essay on Turn Towards Nature | निबंध मुड़ो प्रकृति की ओर | Prakriti Ki Aur Mudo Par Nibandh | मुड़ो प्रकृति की ओर

मुड़ो प्रकृति की ओर पर निबंध

प्राकृतिक सौंदर्य : प्रकति संवभाव से प्राणियों की सहचरी रही है। प्रक्रति का शुद्ध, सतिवक और संतुलित संसर्ग पाकर मनुष्य दीर्घायु पाने की कामना करता रहा है। प्रगति सौंदर्य ईशवरीय है सृष्टि की अलौकिक, अद्भुत अनंत, असीम तथा विलक्षण कला है। प्रकृति सौंदर्य वर्णनातीत है।

मुड़ो प्रकृति की ओर पर निबंध | Essay on Turn Towards Nature

पर्वतों की सूरत से गाड़ियां उनके ही मंडित शिखर, कल-कल बहती नदिया झर झर झर के झरने, फल फूलों से लदे वृक्ष भारतीय भारती के सुमन, विस्तृत हरियाली, आसमान में उड़ते भारतीय भारती के पक्षी, सूर्योदय के समय आकाश में बिखरे स्वर्णिम जावक, सूर्यास्त के समय ढलते सूर्य की लाली, रात्रि में चमकते नक्षश्रगण, चांदनी रात भला किसका मान नहीं मोह लेते। प्रभात बेला में बाल अरुणोदय के समय उड़ते पक्षियों का कलरव, हरी दूब पर मुक्ता के समान चमकती ओस की बूंदे, शीतल मंद सुगंधित समीर तथा मानव मात्र का कार्य में लगने का उपकरण कितना आनंददायी ह।

उषा सुनहरे तीर बरसती, जय लक्ष्मी सी उदित हुई।

मनुष्य द्वारा प्रकृति पर वस

जब से मनुष्य ने विज्ञान की शक्ति पाकर प्रगति से छोड़-छाड़ प्रारंभ की तथा उसका दोहन प्रारंभ किया, तभी से वह प्राकृतिक सुखों से वंचित होता गया। अपने अहंकार, दभ तथा अभिमान के कारण वह सभी को सर्वशक्तिमान समझने लगा और प्रगति के तत्वो पर विजय श्री की कल्पना करने लगा। जब से उसने प्रगति का आंचल छोडा और विज्ञान का दामन थामा, तभी से वह अपने विनाश की खाई सभी खोदने लगा। प्रकृति पर विजय से संपन्न को साकार करने के लिए उसने अनेक आविष्कार किए और समझा कि प्रकृति को उसने अपने वश में कर लिया है।

हानियां

मनुष्य यह भूल गया कि मुंह दिखाई देने वाली प्रगति की वर्ग दृष्टि सर्वनाश का कारण बन सकती है। आज जिस प्रकार चारों और पर्यावरण प्रदूषण तथा प्राकृतित असंतुलन का दौर चल रहा है, रोगों में वृद्धि होती जा रही है, उसका एकमात्र करण मानव की प्रकृति से छेड़छाड़ है। वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण पर्वत स्खलन,भू क्षरण, बाढ़, बेमौसम बरसात तथा पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण शहरों में रहने वाले लोगों का दम घुटता जा रहा है। औद्योगिक प्रगति तथा प्रकृति से दूर होते जाने के कारण सांस लेने के लिए शुद्ध वायु भी अभाव हो गया है।

हमारा कर्तव्य

आज आवश्यकता इस बात की है कि मानव पूर्ण प्रकृति की ओर मुड़े, प्रगति से पुन समाजसय स्थापित करें तथा उसे अपने सहचरी समझ कर उसका सम्मान करें। विश्व के सभी देशों ने इसके परी प्रक्षय मैं अपनी अपनी मोहित छेड़ दी है। आज विश्व भर में प्रदूषण से बचने तथा पर्यावरण की रक्षा का प्रयास किया जा रहा है 15 जून को समूचे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाना इस बात का साक्षी है कि अब मानव ने प्रकृति के महत्व को स्वीकार लिया है तथा उसके सरवन के हर संभव प्रयास की ओर गंभीरता से विचार करने पर विवश हुआ है।

विश्व के सभी देशों की समझ में आ गया है कि जिस प्रगति पर विजय प्राप्त करने का उन्होंने अभियान छेड़ा था, वह उनकी भूल थी। परंतु उन्हें उस भूल को सुधार कर अब प्रगति की ओर मुड़ना है।

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