भ्रष्टाचार :

प्रस्तावना: हमारे देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया था। बेईमानी, मिलावट, रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद, गुटबंदी, चार सो बीसी आदि अंगरक्षकों के साथ भ्रष्टाचार महोदय संपूर्ण राष्ट्र मैं निर्बाध विचरण कर रहे हैं। इस भ्रष्टाचार रूपी दानव में भारत को जकड़ लिया है। इस दानों से कैसे छुटकारा मिले ? यह एक भयंकर समस्या है।

भ्रष्टाचार ने कब और कहां आंखें खोली, यह है बात इतिहास के गर्भ में छिपी है। वैसे स्वार्थ लिप्सा इसकी जननी कथा भौतिक ऐश्वर्य की चाह इसका पिता है। भ्रष्टाचार दो शब्दों से मिलकर बना है-भ्रष्ट+आचार। यानी ऐसा आचरण जो स्वार्थपरता से शुरू होकर दूसरों के अहित पर समाप्त होता है। भ्रष्टाचारी व्यक्ति स्वार्थ में अंधा होकर यह भूल जाता है कि वह अपने कुकृत्यों से न जाने कितनों के दिल पर ठेस पहुंचा रहे है और न जाने कितनों को ही उस श्रेणी में खड़ा कर रहा है,

भ्रष्टाचार :
भ्रष्टाचार :

जिसमें वह स्वयं है। पुरातन युग में दक्षिणा, मध्यकाल में भेंट आदि तथा आधुनिक काल में उपहार यह सब भ्रष्टाचार के ही रूप हैं।
भ्रष्टाचार है सर्वाधिक वादक विकासशील के विकास में।
विकासशील से विकसित बनना है तो भ्रष्टाचार-असुर की इति करो।

कहावत है- यथा राजा तथा प्रजा, जब आज का नेता वह प्रशासक सभी भ्रष्ट हैं तो नीचे वाले कर्मचारी अछूते कैसे रहेंगे ? पैसा सबको प्यारा है। बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं। देश की चिंता किसी को नहीं है ?आज भारतीय जीवन का कोई क्षेत्र सरकारी या गैर – सरकारी, सर्वजनिक या निजी, ऐसा नहीं है, जो भ्रष्टाचार से अछूता हो। फिर भी मोटे रूप से हम इसे तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं- 1 प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत उच्च पदों पर आसीन सचिव, अधिकारी, ऑफिस, सुपरिंटेंडेंट, बाबू, चपरासी, सभी आते हैं।

कैसा भी कठिन से कठिन काम हो, यदि पैसा हाजिर है तो सब काम बन जाते हैं। 2 राजनीतिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत लोकसभा में विधानसभाओं के चुनाव जीतने के लिए अपनाया गया भ्रष्ट आचरण आता है। राजनैतिक अपहरण, हिंसा, हत्या, अत्याचार, अनाचार आदि क्या क्या इसके अंतर्गत नहीं आते ? व्यावसायिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत खाध पदार्थों में मिलावट, गठिया व नकली औषधियां जमाखोरी, चोरी आदि तरीके देश वे समाज को कमजोर बनाने के लिए अपनाए जाते हैं।

भ्रष्टाचार पन्पने के कारणों में मुख्य हैं-पाश्चात्य भौतिकवादी जीवन दर्शन: खाओ, पियो और मौज करो। आज चारों तरफ एक ही आवाज सुनाई देती है- पैसा फेंको काम करवा लें। चपरासी से लेकर बड़े पद पर बैठा हुआ अधिकारी और नेता सब इसके शिकार हैं। आज स्वार्थी लोग रिश्वत को उपहार का नाम देने लगे हैं।

किंतु ऐसा कोई उपहार जो स्वार्थ पूर्ति के लिए दिया जाए, भ्रष्टाचार ही कहलाएगा। भारत का नाम विश्व में कलंकित हो रहा है। यह है यह बुरा कर्म जन सामान्य से लेकर देश के विकास में भी बाधा उत्पन्न कर रहा है
भ्रष्टाचार पनपने के पीछे दोषी कौन है ?क्या रिश्वत लेने वाला, देने वाला यह रिश्वत देने के लिए प्रोत्साहित करने वाला ?इसके लिए सभी दोषी हैं। यदि देने वाला देखा नहीं, तो लेने वाला कहां से लेगा।

यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध हम आवाज नहीं उठा सकते तो यह भी हमारी ही कमजोरी है। भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए- जन लोकपाल बिल को गंभीरता से लिया जाए। चुनाव प्रक्रिया को बदलना आवश्यक है। सरकार अनेक प्रकार के कर समाप्त कर तीन या चार आवश्यक कर ही जनता पर लगाए और कर प्रणाली को इतनी सरल बना दे की सामान्य तथा अशिक्षित लोग वंछित कर आसानी से अदा कर सकें। शासन व्यय सबके सामने सागदी का आदर्श रखा जाना चाहिए।

भारत में बनी हुई चीजों के उपयोग की भावना प्रत्येक व्यक्ति में जागृत की जानी चाहिए। इससे देश का पैसा देश में रहेगा और समृद्धि बढ़ेगी। कानून को इतना कठोर बना दिया जाए कि हर अपराधी को उसके अपराध की सजा मिल सके और दूसरों को सबक। भ्रष्ट व्यक्ति का समाज से बहिष्कार किया जाए, उनके साथ रोटी-रोजी आदि किसी प्रकार न मिल सके और किसी प्रकार का व्यवहार न किया जाए।

भ्रष्टाचार की समाप्ति से ही देश, मानवता और आदर्शों की रक्षा हो सकती है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं है जब वरिष्ठ लोग यहां तक गिर जाएंगे कि वे देश को भी बेच कर खा सकते हैं। संभलो अभी-भी समय है अन्यथा पछताने के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। यदि हम भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहते हैं तो हमें पहले स्वयं को समझना पड़ेगा। उसके बाद एक ऐसा जन – आंदोलन चलाना पड़ेगा, जो भ्रष्टाचारियों का समूल नाश कर दे

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