प्रतापनारायण मिश्र जीवन परिचय | Biography of Pratap Narayan Mishra

प्रताप नारायण मिश्र का जीवन परिचय आधुनिक हिंदी निर्माताओं की बृहत रही में भारतेंदु, हरीश चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट और प्रताप नारायण मिश्र की गणना होती है।प्रतापनारायण मिश्र जी को न तो भारतेंदु जैसे साधन मिले थे और ना ही भट्ट जैसी लंबाई आयु। मिश्र जी ने अपनी प्रतिभा एवं लगन के बल पर उस युग में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान बनाया था।

प्रतापनारायण मिश्र जीवन परिचय | Biography of Pratap Narayan Mishra

जीवन परिचय

प्रतापनारायण मिश्र जी का जन्म उन्नाव जिले के भेजे गांव में हुआ था। इनके जन्म के कुछ दिनों बाद ही उनके ज्योतिषी पिता पण्डित संकटा प्रसाद मिश्र कानपुर आकर सहपरिवार रहने लगे। यहीं पर इनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पिता इन्हें ज्योतिष बढाकर अपने पैतृक व्यवसाय में लगाना चाहते थे, पर इनका स्वभाव मनमौजी था,। जो ज्योतिष में नहीं रहा।

यह कुछ समय तक अंग्रेजी स्कूल में भी पढें किंतु कोई भी अनुशासन और निष्ठा का कार्य जिसमें विषय की नीरसता के साथ प्रतिबद्धता भी आवश्यक होती इनके मनमौजी और पकड़ स्वभाव के विपरीत था। अत यह भी न पड़ सके। घर के स्वाध्याय से ही इन्होंने संस्कृत उर्दू फारसी अंग्रेजी और बांग्ला पर अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया।

साहित्यिक परिचय

प्रतापनारायण मिश्र जी के साहित्यिक जीवन का प्रारंभ बड़ा ही दिलचस्प रहा है। कानपुर उन दिनों लावनी बाजों का केंद्र था और प्रताप नारायण मिश्र जी को लाभ नी अत्यंत प्रिय थी। लावणी बाजों के संपर्क में आकर इन्होंने लावनिया और खयाल लिखना शुरू कर दिया। यहीं से इनके कवि और लेखक जीवन का प्रारंभ हुआ।

प्रतापनारायण मिश्र जी साहित्यकार होने के साथ सामाजिक जीवन से भी जुड़े थे। सामाजिक, राजनीतिक धार्मिक संस्थाओं से इनका निकट का संपर्क था और देश में जो नवजागरण की लहरा रही थी उसके प्रति भी सचेत थे। वास्तव में संदेश ही जीवन तक पहुंचाने के लिए इन्होंने साहित्य सेवा का व्रत लिया और ब्राह्मण पत्र के आजीवन संपादक रहे।

प्रतापनारायण मिश्र जी बहुमुखी प्रतिभा और विविध रूचियों के धनी थे कानपुर में होने नाटक सभा नाम की एक संस्था बनाई थी। उसके माध्यम से ये फारसी थिएटर के समानांतर हिंदी का अपना रंगमंच खड़ा करना चाहते थे ये समय भी भारतेंदु जी की भांति कुशल अभिनय करते थे।

प्रतापनारायण मिश्र जी भारतेंदु जी के व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित थे तथा उन्हें अपना गुरु मानते थे ये बाग वैद्य प्रभावित के धनी थे और अपनी हाजिर जवाबी एवं विनोदी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। कानपुर में 38 वर्ष की अल्पायु में ही ये स्वर्ग सिधार गए।

रचनाएँ

  • निबंध – निबंध नवनीत, प्रताप पीयूष, प्रताप समीक्षा आदि।
  • नाटक – गो संकट, हटी हमीर, भारत दुर्दशा, कली को दुख, फली प्रभाव।
  • अनुवादित – पंचामृत, इंदिरा, नीती रत्नावली।
भाषा शैली

हिंदी के खड़ीबोली गद्य के निर्माताओं में प्रताप नारायण मिश्र जी का प्रमुख स्थान है। इनकी भाषा पर वह युक्त, सुबोध एवं मुहावरेदार है। इन्होंने गंभीर और साधारण, दोनों प्रकार के विषयों पर रोचक निबंध लिखे हैं।, बात, बुढ़ापा, दाँत, भो, रिश्वत, बुच, धोखा, बंदरों की सभा आदि। साधारण विषयों के अतिरिक्त उन्होंने प्रचलित कहावत तो पर भी निबंध लिखें है

जैसे मरे को मरे शाह मदार, तथा समझदार की मौत। इसके अतिरिक्त प्रताप नारायण मिश्र जी ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर भी विचार पूर्ण गंभीर निबंध लिखे हैं। इन के निबंधों में हास्य एवं व्यंग्य का पुट रहता है, और जब खेलते हैं जिसके कारण निबंधों में नहीं देते हैं लेकिन चुटीलापन और जिंदादिली दिखाई देती है।

प्रतापनारायण मिश्र जी की शैली हास्य विनोद पूर्ण है। बता नारायण प्रताप नारायण मिश्र की शैली के दो रूप पाए जाते हैं – विनोद आत्मक हास्य व्यंग मई शैली तथा गंभीर विवेचनात्मक शैली। गंभीर विषयों के विवेचन में इन्होंने विवेचनात्मक शैली अपनाई है।

बात प्रतापनारायण मिश्र जी की हास्य व्यंग्य प्रधान शैली जो इनकी प्रतिनिधि शैली कही जाती है के अंतर्गत आने वाले प्रसिद्ध निबंधों में से एक है। लेखक ने इसमें बात के विषय में सभी ज्ञातव्य बातों का सहज समावेश किया है लेखक कि स्वच्छंद कल्पना और शैली की रोचकता का समवेत सौंदर्य है इसलिए की विशेषता है।

 

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