पर्यावरण प्रदूषण प्रदूषण के कारण व निवारण |environmental pollution causes and prevention

 

बीसवीं सदी विज्ञान का युग है। आज मानव ने विज्ञान को सहारे पृथ्वी आकाश जल तथा अंतरिक्ष में अपना अधिकार जमा लिया है। आज उसने असंभव को संभव कर दिखाया है और अनेक भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए उपकरणों कल कारखानों एवं उधोगों को विकसित किया है। समय के चक्र के साथ जहां मानव ने अन्य क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है,

वही जनसंख्या में भी वृद्धि हुई है जनसंख्या की वृद्धि के कारण उसने ग्राम नगर एवं महानगरों की बनावट को भी विस्तार देना प्रारंभ कर दिया है। इसके लिए प्राकृतिक वनों आदि को काट काट कर उधोग धंधों का विस्तार किया जा रहा है। खेती योग्य भूमि पर उधोग धंधों का निर्माण हो रहा है तथा गांव की जनसंख्या का पलायन शेरों की ओर हो रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण प्रदूषण के कारण व निवारण

फलस्वरूप ग्राम तथा ना गुरुओं का संतुलन बिगड़ गया है। जंगलों में रहने वाले दुर्लभ जीव जंतु एवं पशु पक्षियों का नामोनिशान मिट रहा है। वनों से वातावरण में जो शुद्धता रहती थी, उसमें कमी आ गई है। चिमनियों से निकला दुआं गैस तथा मिलो से बहने वाले पदार्थों से सारा वातावरण दूषित हो गया है-इसी को प्रदूषण कहते हैं। भारत में ही नहीं, विश्व के लगभग सभी बड़े नगरों में जहां उधोग धंधे विकसित हैं, इस समस्या का बोलबाला है।

पर्यावरण प्रदूषण प्रदूषण के कारण व निवारण

उधोग धंधों के विस्तार के कारण कल कारखानों से दूषित जल मल तथा विषैला पदार्थ बाहर निकलते रहते हैं। उसने बदबू आती है। चिमनियों से निकला दुआ दुआं वायुमंडल को दूषित करता है। इस दूषित वायु में सांस लेने से फेफड़ों के रोग पनपते हैं। जब तक पेड़ पौधों की अधिकता रही और वनों को नहीं काटा गया तब तक वह वायुमंडल को शुद्ध करते रहे। उनके काटे जाने पर प्रदूषण की समस्या का भयंकर रूप सामने आने लगा है

पर्यावरण प्रदूषण  के कारण |

वायुमंडल के प्रदूषण से जनसाधारण के व्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। गंदी वायु में सांस लेने से न केवल फेफड़ों के रोग पनपते हैं, अपितु रक्त शुद्ध नहीं रह पाता है। इससे चर्म रोग हो जाते हैं और आंखों की ज्योति कम होने लगती है। प्रदूषित पानी पीने से बढ़ जाते हैं। इससे मशीनों पता कल कारखानों और वाहनों के शोर से ध्वनि प्रदूषण होता है। इससे कान बहरे हो जाते हैं।

प्रदूषण से बचने के लिए यह आवश्यक है कि प्राकृतिक एवं मानव निर्मित वातावरण में तालमेल बना रहे। मानव उधोग धंधों का विकास अवश्य करें, लेकिन प्राकृतिक संतुलन को खंडित न करें। वनों पवृतों, नदियों उपवन ओ जलाशयों आदि को नष्ट न किया जाए। शहरों में प्रदूषण अधिक होता है, अतः उधोग धंधों को शेरों से दूर रखा जाए।

जिन कारखानों में दुआं बदबू मेल आदि निकलता है, उन्हें बस्तियों से बहुत दूर बसाया जाए। हाल ही में भोपाल में जहरीली गैस निकलने से निवास की जो तांडव लीला हुई, उसे भुलाया नहीं जा सकता। महानगरों में निवास चिकित्सा जलमल के निष्कासन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। वृक्षारोपण इस दिशा में बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

गांव में छोटे उधोग धंधों का विकास करके गांव की जनसंख्या का शहरों की ओर होने वाला अतिक्रमण रोका जाना चाहिए। यदि आज का मानव सचेत न हुआ उसने प्रकृति से तालमेल न रखा तो वह दिन दूर नहीं, जब प्रदूषण की समस्या उसके नियंत्रण से बाहर हो जाएगी।

 

 

 

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