नवयुवकों पर चलचित्र का प्रभाव|effect of film on youth

आज के युग में मनोरंजन का सबसे, बड़ा सस्ता, सुलभ एवं आकर्षक साधन सिनेमा या चलचित्र ही है। आज के व्यस्त मानव के पास इतना समय नहीं है कि वह प्रेक्षागृह में जाकर नाटक आदि देख सके अथवा किसी अन्य साधन से अपना मनोरंजन कर सके। आज मानव को कोई ऐसा साधन चाहिए, जो थोड़े ही समय में अधिक से अधिक घटनाओं को उसके सम्मुख प्रस्तुत कर सके और नृत्य, संगीत नाटक अभिनय आदि सभी कुछ का आनंद ले सके। चलचित्र इसी उधेशय की पूर्ति करते हैं।

नवयुवकों पर चलचित्र का प्रभाव
नवयुवकों पर चलचित्र का प्रभाव

आज के मानव तथा विशेषकर विद्यार्थी वर्ग पर चलचित्र का जितना प्रभाव पड़ता है, इतना मनोरंजन के किसी अन्य सदन का नहीं। दुर्भाग्य से आज के चलचित्र निर्माता ऐसी फिल्मों का निर्माण करते हैं, जो चारित्रिक पतन का कारण बनती हैं और जिन से मानवीय मूल्यों का हास होता है। चल चित्रों ने व्यक्ति की वासना को बढ़ावा दिया है। आज का विद्यार्थी फिल्मों का इतना शौकीन है कि वह इसके पीछे अपना खाना पीना भी भूल जाता है।
चलचित्र ने विद्यार्थी को फैशन की ओर प्रवृत्त किया है। सिनेमा में तरह-तरह के फैशन दिखाए जाते हैं। विद्यार्थी भी उन्हीं फैसनों को जीवन मैं उतारना चाहते हैं। सिनेमा ने फैशन को जन्म दिया है। सिनेमा के अधिकांश कथानकों मैं शराब, जुआ, तस्करी, मारधाड़, लूट ,पाट हत्या, चोरी, डकैती, कामुक दुशयों आदि की भरमार रहती है।

नवयुवकों पर चलचित्र का प्रभाव

चोरी करने, लौटने तथा अपराध की अन्य प्रवृतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। कैबरे तथा डिस्को नृत्यों एवं कामुक दृश्यों वाली फिल्में देखने से छात्रों का चारित्रिक पतन हो रहा है। बलात्कार, चुंबन, अपहरण तथा अन्य कामुक दृश्यों से नैतिकता विनष्ट होने लगी है।

उपर्युक्त विवेचन से यघपि यह है स्पष्ट है कि सिनेमा ही छात्रों के नैतिक पतन का मुख्य कारण है। परंतु अच्छे चलचित्रों द्वारा इन दोषों को दूर किया जा सकता है। अछूत प्रथा, बेमेल विवाह, जाति प्रथा, शोषण, अन्याय आदि के विरुद्ध विद्यार्थियों को तैयार करने में चलचित्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। देश की समस्याओं, संप्रदायिकता, वर्ग विदेष, भाषा_ भेद तथा जैसी घातक प्रवृत्तियों को भी चलचित्रों द्वारा ही दूर करने में सहायता मिल सकती है।

अच्छे चलचित्र बनाना ही निर्माताओं का उधेश्य होना चाहिए। इसके लिए सेंसर को अधिक सख्त बनना पड़ेगा तथा निर्माताओं ने अपने उत्तरदायित्व को वहन करना होगा। यदि स्वास्थ्य फिल्मों का निर्माण हुआ, तो वह दिन दूर नहीं, जबकि चलचित्र देश, राष्ट्र, समाज तथा व्यक्ति के निर्माण में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

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