दहेज- प्रथा : एक अभिशाप

प्रस्तावना: भारतीय समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों में दहेज-प्रथा सबसे बड़ा कलंक है। इस प्रथा के कारण भारतीय समाज पतन के गर्त में गिरता जा रहा है। पिछले 20-25 वर्षों से यह समस्या इतना विकराल रूप धारण करती जा रही है की यदि इस पर अंकुश नेश लगाया गया, तो यह है समाज की नैतिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न ही कर देगी। इस प्रथा ने भारतीय समाज को घुन खाई लकड़ी के सामान अशक्त कर दिया है। इस भयंकर प्रथा के कारण सहसों नारियां घर छोड़ने पर विवश हुई हैं:

सहस्त्रों अपने प्राणों की बलि दे चुकी हैं और न जाने कितने ही परिवार पर बोझ बनकर नारकीय जीवन की वैतरणी में बिलबिला रही हैं
विवाह के समय कन्या के पिता द्वारा अपना स्नेह प्रदर्शित करने के लिए वर- पक्ष को यथाशक्ति जो उपहार दिया जाते हैं-यही दहेज है। भारतीय समाज में लड़की विवाह के बाद अपने पिता का घर छोड़ कर अपना नया जीवन प्रारंभ करने पति के घर जाती है

दहेज- प्रथा : एक अभिशाप
दहेज- प्रथा : एक अभिशाप

अतः इस अवसर पर भेंट स्वरूप वस्तुएं दी जाती हैं। इस प्रथा का आरंभ कब हुआ, यह कहना कठिन है। हमारे प्राचीन ग्रंथों तथा लोक कथाओं में दहेज- प्रथा का वर्णन मिलता है।
समय के साथ-साथ अनेक परंपराएं टूटती बनती रहती हैं तथा उनमें अनेक परिवर्तन होते रहते हैं। 1000 वर्ष की पराधीनता ने दहेज- प्रथा का विकृत रूप हमें प्रदान किया है।

स्वाधीनता के 50 वर्षों के बाद भी यह है पर था ज्यों-की- त्यों बनी हुई है। आज कन्या की शेष्टता उसके शील, सदाचार, शिक्षा तथा सौंदर्य से नहीं, अपितु दहेज से आंकी जाने लगी है। आज दहेज एक अनिवार्यता बन कर छा गया है।
इस पर्दा के कारण मध्यम वर्ग की दशा दयनीय हो गई है। इस प्रथा से धन लोलुपता को बढ़ावा मिला है, जिसके कारण भारतीय समाज पतन के गर्त में गिरता जा रहा है।

बेमेल विवाह, आत्महत्या, भ्रष्टाचार, तलाक आदि कुप्रथाएं तथा अन्य सामाजिक कुरीतियां प्रथा के कारण बढ़ रही हैं। इसका प्रमाण नित्य अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि किसी नाव-वधू को दहेज कम लाने के कारण आत्महत्या करनी पड़ी: किसी को मिट्टी का तेल छिड़ककर जला दिया गया आदि। इस प्रथा के कारण लोग बेईमानी, चोर बाजारी, तस्करी आदि से धन जमा करते हैं तथा दहेज के रूप में देते हैं।
दहेज – प्रथा का प्रमुख कारण यह है कि आज के समाज में नारी को आज भी पुरुष से हीन समझा जाता है। इस प्रथा का एक कारण स्वयं नारी समाज भी है। पुरुष दहेज प्राय: अधिक ध्यान नहीं देता, फिर घर की नारियां ही वधू को सताती हैं।
इस भयंकर प्रथा के उन्मूलन का बीड़ा सन 1928 में राष्ट्रीयपिता गांधी जी ने उठाया था। सन 1961 में सरकार ने दहेज विरोधी कानून भी पारित किया, पर इसकी धाराएं लचर होने के कारण इन पर सख्ती से अमल नहीं हो पाया। सरकार ने इन कानून में और संशोधन करके इसे और कड़ा बना दीया है।

उसका उल्लंघन करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान रखा गया है। इस प्रथा को कानून द्वारा नहीं, जन -चेतना जागृत करके रोका जा सकता है। अतः इस भयंकर अभिशाप से मुक्ति के लिए नारी की आर्थिक स्वतंत्रता बहुत आवश्यक है। रेडियो, टी ,वी चलचित्र, नाटकों, कहानियों आदि के द्वारा जनमानस को इसके विरुद्ध जगाया जा सकता है।

दहेज रूपी इस दानव ने कितने ही खुशहाल घरों को वीरान कर दिया है। यदि इसका अंत शीघ्र नहीं किया गया, तो यह संपूर्ण समाज के लिए नासूर बन जाएगा। इसका समाधान करने में युवा इसका समाधान करने में युवा-पीडी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। यदि आज का युवा वर्ग इन वर्तमान परंपराओं का तिरस्कार कर दे, तो यह समस्या आसानी से सुलझ सकती हैं।

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