त्रिलोचन शास्त्री का जीवन परिचय | Biography of trilochan sastry

त्रिलोचन शास्त्री का पूरा नाम वासुदेव सिंह था। इनका जन्म 20 अगस्त, सन् 1917 को जनपद सुल्तानपुर के चिरानीपट्टी, कटघरापट्टी में सामान्य मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था, शैक्षिक योग्यता बीए ,अंग्रेजी साहित्य में एमए, पूर्वार्ध तक रही है पर अपने अध्यवसाय से इन्होंने अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, पाली, प्राकृतिक तथा हिंदी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने वर्ष 1951-तरेपन मैं गणेश राय। इंटर कॉलेज डोभी में अध्यापन कार्य भी किया।

त्रिलोचन शास्त्री का जीवन परिचय | Biography of trilochan sastry

आज, जन वार्ता, समाज, प्रदीप, हंस और कहानी पत्रिकाओं के सम्पादन-कार्य में सहयोग भी किया। सन 1972 मैं विदेशी छात्रों को हिंदी, उर्दू और संस्कृत की शिक्षा प्रदान की। कुछ वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में द्विभाषीय कोष हिंदी उर्दू परियोजना में भी कार्य किया। मुक्तिबोध सृजन पीठ के अध्यक्ष के रूप में सागर विश्वविद्यालय को माँ मध्य प्रदेश में कार्यरत रहे। उन्हें ताप के ताए हुए दिन, संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। उन्हें मैथलीशरण गुप्त पुरस्कार भी मिल चुका है। 9 दिसंबर सन् 2007 को आपका देहावसान हो गया।

त्रिलोचन शास्त्री रचनाएँ

त्रिलोचन शास्त्री के प्रकाशित काव्य संग्रह में धरती, गुलाब और बुलबुल, दिगंत, ताप के ताए हुए दिन, शब्द उस जनपद का कवि हूँ, अर्ध तुम्हें सप्ता हूँ फुल नाम है एक, सब का अपना आकाश और अमोला चर्चित और प्रसिद्ध है।

रोजनामचा नाम से उनकी डायरी भी प्रकाशित है बहुत कुछ अप्रकाशित भी है

त्रिलोचन शास्त्री आम आदमी, किसान और कामगार के मजदूर और मध्यवर्गीय समाज के सच्चे और विश्वसनीय चित्र कान है। कविता को काल्पनिकता के रोमानी आकाश से धरती पर उतार कर सबकी सुख दुख, सब की पीडा, सब की करुणा से व्यापक जन संसार को उन्होंने जोड़ा, उनकी कविता में सहेजता है, शालीनता है, गंभीरता और रवानी है, वे सपाट बयानी से एक संपूर्ण दृश्य-चित्र सरजीत करते हैं।

त्रिलोचन शास्त्री का व्यक्तित्व लगभग 50 वर्षों से अधिक समय तक प्रसारित है। इन 50 वर्षों की लंबी कालावधि में उन्होंने सुल्तान पुर, जौनपुर, प्रयाग, वाराणसी दिल्ली, सागर में प्रवेश किया तथा दिन जीवन के प्रत्येक पहलू को समझने का उपक्रम किया।

भाषा

अपरिहार्य ,देशज, ढीठपन उनकी भाषा की शक्ति है। चूँकि त्रिलोचन एक समग्र चेतना के कवि हैं इसलिए उनकी भाषा में भी यह है समग्रता दिखाई देती। होंगी रैन बसेरा रैन बसेरा कविता की बुनावट में भाषा और संवेदनीयता के कई स्तर दिखाई देते हैं।वह सहज भाषा को, बोलचाल की भाषा को काव्यात्मक गरिमा देते हैं।

कवि त्रिलोचन का अनुभव-संसाधन बढ़ा है और सब बेस्ट चयन भी उन्होंने बड़े और व्यापक क्षेत्रों से किया है। पांच संस्कृतिनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से वे अपनी स्वाध्याय वृत्ति को प्रमाणित करते हैं। अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों को वे सहजता से भयावहता कर देते हैं। जीवन के विविध क्षेत्रों से शब्द चयन उन्होंने किया है।

उन्होंने तद्भव शब्दों का अर्थ गर्भ प्रयोग किया है। हॉरर डॉल, बेंचना-की ना, मंजर गए आम,जैसे तद्भव और ग्रामीण प्रयोग उन्हें सहज-सरल- चित का कभी बनाता है।

जेवरी बुनना, उड़ंछू, बाजार गिरे, बॉनी पुर होना जैसी, लोग ओकती के साथ ही साथ, शेख हैंड, मास्टर, ब्यूटी, क्वीन जैसे अंग्रेजी शब्दों को भी वे विरोध के चलते हैं। अवधि की सृजनात्मक क्षमता को परिनिष्ठित खड़ी बोली हिंदी में उतारने के अद्भुत क्षमता के कवि हैं त्रिलोचन। हिंदी की जातीय अस्मिता के लिए त्रिलोचन तुलसी की सहजता और गालिब की संस्था को एक साथ साधते हैं।

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