कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जीवन परिचय | Biography of Kanhaiyalal Mishra Parbhakar

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर कौन थे? कहां के रहने वाले थे ? आज हम इन सब के बारे में जानेगे…..

जीवन-अवधि: सन् 1906—1995 ई०

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर स्वतंत्रता-संग्राम की ज्योति और पत्रकारिता की साधना में जिन साहित्यकारों को गद्य शैलीकारों का अभ्युदय हुआ है, उनमें प्रभाकर जी का विशिष्ट स्थान है। हिंदी में लघुकथा, संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज की अनेक विधाओं का इन्होंने प्रवर्तन और पोषण किया है। ये एक आदर्शवादी पत्रकार रहे हैं। आत: इन्होंने पत्रकारिता को भौतिक स्वार्थों के सिद्धि का साधन न बनाकर उच्च मानवीय मूल्यों की खोज और स्थापना में ही लागाया है।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जीवन परिचय | Biography of Kanhaiyalal Mishra Parbhakar

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी का जन्म एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में 19 मई 19061 ई० देवबन्द (सहारनपुर) में हुआ था। इनके पिता पं० रामदत्त मिश्री की आजीविका पूजा-पाठ और पुरोहिताई थी, पर विचारों की महानता और व्यक्तित्व की दृढ़ता में वे श्रेष्ठ थे। पिता का स्वभाव अत्यंत सरल और सात्विक था, परंतु माता जी का स्वभाव बड़ा ही उग्र था। अपने एक संस्मरण में लेखक ने दोनों का परिचय देते हुए लिखा है,”

पिताजी दूध मिश्री थे मां तो लाल मिर्च”। इनकी शिक्षा प्रायः नगण्य ही हुई। एक पत्र में इन्होंने लिखा है,” हिंदी शिक्षा (सच माने) पहली पुस्तक के दूसरे पाठ ख-ट-म-ल खटमल, ट-म-टम टमटम। फिर साधारण संस्कृत। बस हरि ओम्। यानी बाप पढे न हम”। उस किशोर अवस्था में जब कि व्यक्तित्व के गठन के लिए विद्यालयों की शरण आवश्यक होती है, प्रभाकर जी ने राष्ट्रीय संग्राम में भाग लेना ही अधिक पसंद किया। जब यह खुर्जा के संस्कृत विद्यालय में पढ़ रहे थे तब इन्होंने प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता मौलाना आसफ अली का भाषण सुना।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर इस भाषण का इन पर इतना असर हुआ कि यह परीक्षा छोड़कर चले आए और उसके बाद इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा में लगा दिया। यह सन् 1930- 32तक और सन् 1942 में जेल में रहे हो निरंतर राष्ट्र के उच्च के नेताओं के संपर्क में आते रहे। देश के स्वतंत्र होने के बाद इन्होंने अपना शेष जीवन पत्रकारिता में लगा दिया। इनके लेख इनके राष्ट्रीय जीवन के मार्मिक संस्मरणो की जीवन्त झाँकियाँ हैं, जिनमें भारतीय स्वाधीनता के इतिहास के महत्वपूर्ण पृष्ठ भी हैं। लेखन के अतिरिक्त अपने वैयक्तिक स्नेह और सम्पर्क से इन्होंने हिन्दी में लिखने के लिए अनेक नये लेखको को प्रेरित किया। 9 मई, 1995 ई० को इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी के प्रसिद्ध ग्रन्थ है—

  1. .आकाश के तारे,
  2. धरती के फूल (लघु कथा- संग्रह);
  3. जिंदगी मुस्कुराई,
  4. भूले बिसरे
  5. महके आँगन चहके द्वार,
  6. माटी हो गई सोना,
  7. नई पीढ़ी के विचार (रेखाचित्र);
  8. दीप जले शंख बजे (संस्मरण);
  9. .बाजे पायलिया से घुँघरू,
  10. शरण बोले कन मुस्काए (ललित निबंध)।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी के संपादन में सहारनपुर से दो पत्र प्रकाशित होते रहे

नया जीवन और विकास। इन पत्रों से तत्कालीन ,राजनीतिक सामाजिक और शैक्षिक समस्याओं पर इनके निभींक आशावादी विचारों का परिचय प्राप्त होता है।

प्रभाकर जी का गद्य इनके जीवन से ढलकर आया है। इनकी भाषा में इनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, विचारों की सत्यता, अन्याय के प्रति आक्रोश, सेहदयता उदारता और मानवीय करुणा की झलक मिलती है। अपने विचारों में यह उदार, राष्ट्रवादी और मानवतावादी हैं। इसीलिए देश प्रेम और मानवीय निश्चित निष्ठा के अनुरूप इनके लेखों में मिलते हैं। इन्होंने हिंदी गद्य को नये मुहावरे नयी लोकोक्तियाँ और नमी सुक्तियाँ और नई दी हैं। कविताएँ इन्होंने नहीं लिखी पर एक कवि की भावुकता और करुणा इनके गद्य में ही छलकती है। यथार्थ जीवन की ददर्भरी अनुभूतियों से इनके गद्य में भी कविता का सौंदर्य भर उठा है। इसीलिए इनके शब्द- निर्माण में जगह-जगह चमत्कार हैं, वार्तालाप में वैदग्धता है

और परिस्थिति के चित्रण में नाटककियता है। इनके वाक्य-विन्यास में भी विविधता रहती है। पात्रों और परिस्थितियों के साथ इन्होंने वाक्य-रचना भी बदली है। विनोद की परिस्थितियों में छोटे वाक्य, चिन्तन की मन: स्थिति में लंबे वाक्य और भावुकता के क्षणों में व्याकरण के कठोर बंधन से मुक्त कवित्वपुरण वाक्य रचना भी की है। निश्चय ही ये हिंदी के एक मौलिक शैलीकार है। इनकी मुख्य गद्य विधा रिपोर्ताज है। भाषा के साथ-साथ प्रभाकर जी की शैली में भी पर्याप्त विविधता है।

इनके निबंधों में शैली के विविध रूप दृष्टिगत होते हैं। अपने अधिकांश रचनाएं कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी ने भावात्मक शैली में लिखी है। इस शैली की भाषा सुललित है तथा वाक्य भी अधिक लम्बे नहीं है। अपने वर्णनात्मक प्रसंगों को सजीव और आकर्षक बनाने के लिए इन्होंने वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया है।

की भाषा सरल है। गंभीर से गंभीर विषय को भी अपने अनुभव के आधार पर आप आसानी से व्यक्त कर देते हैं। ऐसे निबंधों में आप विचारात्मक शैली का सहारा लेते हैं। आपकी रचनाओं में स्थान- स्थान पर आलंकारिक और नाटकीय शैली के भी दर्शन होते अपनी भाषा और शैली की अद्वितीयता के कारण हिंदी साहित्य अपने इस महान् साहित्यकार को सदैव याद रखेगा।

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